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पांजे कच्छ मे पांजी हाजरी

पांजो कच्छ भधली रह्यो आय.
घणें रीते प्रगती करे रह्यो आय. तें छता पांजे मादरे वतन मे पांजी हाजरी इतरी ओछी कोला आय ?
कच्छ मे औद्योगिक क्रांति थई रई आय. खेती मे नवा नवा प्रयोगो ने आविष्कार थई रह्या अईं. जडा खाली मोंग, गोवार, बाजर थिंधा वा हणें केळा, केसर केरी, दाडम, खारक जा भगीचा लहेराइ रह्या अईं.
डेरी उद्योग जे विकासथी पशुपालन में प तेजी आवई आय. गायुं, मेइजा तबेला भनेला लगा अईं. अरे……हणें त ओठडी जो दूध प डेरी मे वनेतो अतरे ओठ, ओठडी जी संख्या प वधेला लगी आय.
बांधकाम जी प्रवृत्ति मे प तेजी आवई आय हॅडेमे पांजी सनी हाजरी, गेरहाजरी मन मगज के चंधामे वजॅती.

कोरो पां फक्त मुंबई जी तकलादी ने जीवलेण भौतिक सोख समृद्धि मे फसेला रॉबो . लखेंजा ने हणें करोडेंजा वन बेड, टु बेड के थ्री बेड होल किचन जे सांकडे फ्लेट ला, कच्छजे वडे….डेली वारे आंगण , ओसरी, करइ वारे घरें के भोली वॅबो .
विशाळ जमीनें के पारकें जे हवाले करेने कच्छ जी भूमि के,पांजी मातृभूमि के पां भोली वॅबो ?
कच्छ साथेजो पांजो सबंध कोरो फक्त दहेरासर जी धजा, वर्षगांठ, पयुर्षण के माताजी जी पॅडी पूरतो ज रखबो ?
मुंबई जी गर्दी मे गुंगळाइ ने मरे पॅला ही विचारेजो जरुरी आय……
जय कच्छ !

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